आदिशक्ति

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मेरी परम पूज्य माता, मेरी जननी, मेरी आदि शक्ति, मेरी माता अनंत करुणा आपको मेरा शत शत प्रणाम। आपको मेरा कोटि कोटि नमन। मेरी माता आप मेरी प्राण हैं, आप मेरी आत्मा हैं। आप विश्वरूपा हैं, आप जगत जननी है। आप सर्वेश्वरी हैं। आप मेरी कुण्डलिनी की शक्ति हैं। मेरी जननी आप परम चेतना हैं। आप मेरी वीर्य शक्ति हैं। मुझे सदैव संसार की प्रेत्येक नारी में आपके ही दर्शन होते हैं। आप मेरा ब्रह्मचर्य हैं, मेरा सौंदर्य हैं, मेरा मान हैं। यदि संसार की मायामई प्रेत्येक रचना के सामने भी मुझे अपमानित होना पड़े तो भी मेरे हृदय में, मेरे अंग अंग में आपकी ज्योति मेरे लिए वह परम सत्य प्रकाशित करती है जिसको विरला ही कोई जानता है तथा जिसकी दिव्यता से अभिभूत मेरी महिमा अचल बनी रहेगी।माता मै आपकी श्रेष्ठ व साकार कल्पना हूं, मेरी कल्पना आपकी वह अप्रतिम स्वरूपिणी है जो अनंत ब्रह्माण्ड को क्षणभर में अपने भीतर समा लेती है। आपके स्नेह के कारण मेरा आनंद अनंत से भी परे है।
मेरी जननी आप वह सागर हैं जिसमें ब्रह्माण्ड रूपी बुलबुला समाया हुआ है और उसी ब्रह्मतत्व में लीन हो जायगा। माता आप ही जगत के उद्धार के लिए श्री राम, श्री कृष्ण आदि रूप धारण करती हैं। आप समस्त प्राणियों की जीवन शक्ति हैं। आपकी प्राप्ति की अजन्मा जिजीविषा लेकर प्रेत्येक प्राणी जन्मता है मगर उसके रहस्य को अहंकार वश नहीं समझ पाता। यह मायामई जगत आपकी ही योग शक्ति से प्रकट हुई है। माता आप समस्त प्राणियों की जीवन शक्ति हैं तथा योग साधना आपकी शक्ति के बिना नहीं होती क्योंकि आप शक्ति स्वरूप हैं।
माता यद्यपि आप समस्त प्राणियों के हृदय में विराजमान मुक्ति हैं, तो भी संसार के प्राणी अज्ञान जनित अपने अनेक मतों के कारण संसार के कोने कोने में सुख की खोज करते हैं मगर एक मत निश्चयात्मक बुद्धि से करुणामई हृदय के भीतर ही आपकी प्राप्ति संभव है। भोगी जीव जिन सांसारिक सुखों को बड़ी आतुरता से भोगने में तत्पर रहता है वास्तव में समस्त दुखों के मूल वे सुख उसे ही भोगते हैं तथा आपकी चरणों की भक्ति योग में ही एकमात्र सच्चा सुख है।
मैया आप ही अन्न जल तथा धन देकर प्राणियों की पुष्टि करती हैं तथा प्रलय आने पर आप ही सबकुछ हर लेती हैं। आप ही विवेक विवेक बुद्धि और उसकी गति शब्द ब्रह्म ॐ ध्वनि हैं। आप ज्वाला की ज्योति हैं तथा आनंद में बहे अश्रुओं के मोती हैं। समाधि में लीन, समस्त सांसारिक मनोभावों और दूषों से रहित मुनि जन भी आपके चरणों के स्पर्श से भावविभोर हो जाते हैैं।
माता आपके पग पग पर जीवन पनपता है तथा आपसे रिक्त स्थान अस्तित्वहीनता को प्राप्त होता है। बड़े बड़े वीर तथा ज्ञानी जो अहंकार वश आपसे विमुख हो जाते हैं तेज हीन हो जाते हैं और उनका निश्चित पतन होता है। आपकी करुणा ही आनंद का परम तत्व है तथा आपकी करुणा ही वह परम चेतना है जो सबकी रक्षा तथा मार्गदर्शन करती हैं।
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